Delhi Slum Demolition: मौजूदा सरकार का मानना है कि नरेंद्र मोदी के लोक कल्याण मार्ग स्थित निवास की सुरक्षा की दृष्टि से ऐसा किया गया है. लेकिन नरसिम्हा राव, इंद्र कुमार गुजराल, एच डी देवगौड़ा, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के दौरान ये झुग्गियां सुरक्षा में आड़े नहीं आ रही थीं. विश्वगुरु महानतम प्रधानमंत्री को डर आखिर क्या अपने पड़ोस की झुग्गियों, जिमखाना क्लब से लग रहा है.
अदालत के आदेश के बाद बुलडोजर चले और देखते ही देखते सैकड़ों परिवारों की पूरी दुनिया मलबे में बदल गई. फिर उन्हें सावदा घेवरा में फ्लैट दे कर कहा गया- लो, अब नई जिंदगी शुरू करो. सावदा घेवरा मूल स्थान से लगभग 45 किलोमीटर दूर है. वहां रोजगार, स्कूल, परिवहन और अन्य बुनियादी सुविधाओं का अकाल है.
सरकार ने गरीबों को नई जिंदगी शुरू करने के लिए तो कह दिया मगर नई जिंदगी शुरू होने के साथ एक नया सवाल सामने खड़ा हो गया- अब वोट कहां डालें?
यानी, पहले घर का पता बदला, अब लोकतंत्र का पता भी बदलना है. लेकिन कैसे? इस का जवाब किसी के पास नहीं है.
77 वर्षीय लल्लू जैक की परेशानी सुनिए. लोग उन्हें सलाह दे रहे हैं कि पुराने बीआर कैंप जाओ, वहीं से फौर्म लो और वहीं जमा करो. लेकिन जिस जगह जाने के लिए कहा जा रहा है, वहां अब उन का घर ही नहीं बचा. वहां सिर्फ खाली मैदान और मलबा है. ऐसे में वे पूछते हैं- 'जब घर ही नहीं रहा तो फौर्म में पता क्या लिखें?'
उन की परेशानी सिर्फ कागज की नहीं, जेब की भी है. सावदा घेवरा से पुराने इलाके तक आनेजाने में करीब एक हजार रुपए खर्च हो जाते हैं. एक फौर्म लेने और जमा करने के लिए कोई गरीब इतना पैसा कहां से लाए?
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